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Narsingh Dev Ji Mandir

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श्री नरसिंह देव जी मंदिर

श्री नरसिंह देव जी महाराज मंदिर लगभग 500 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है, जो जमीन से 50 फुट की ऊँचाई पर श्री गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा एवं तलहटी में, गोवर्धन महाराज के चरणों को स्पर्श करते हुए पुरानी परिक्रमा मार्ग में किलेनुमा बना हुआ है।

इस मंदिर में अति प्राचीन स्वयं प्रगट हुई श्री गोवर्धन पर्वत से निकली सालिगराम पत्थर से बनी हुई नृसिंह अवतार मूर्ति विराजमान है। यहाँ से श्री गिर्राज महाराज के संपूर्ण दर्शन होते हैं तथा यह मंदिर गिर्राज महाराज के चरणों को स्पर्श करते हुए बना हुआ है।

यह पावन स्थल ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओं की तपोभूमि रहा है, जहाँ ISKCON संस्था के संस्थापक श्री प्रभुपाद जी महाराज ने भी कुछ समय तपस्या की थी। आज भी यह मंदिर देश-विदेश के श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

Narsingh Dev Ji

मंदिर का इतिहास

500+ वर्ष पूर्व

मंदिर की प्राचीनता एवं स्वयं प्रकट प्रतिमा

श्री नरसिंह देव जी महाराज मंदिर लगभग 500 वर्ष से भी अधिक पुराना है। यह मंदिर जमीन से 50 फुट की ऊँचाई पर, श्री गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा एवं तलहटी में स्थित है। इस मंदिर में अति प्राचीन स्वयं प्रगट हुई श्री गोवर्धन पर्वत से निकली सालिगराम पत्थर से बनी हुई नृसिंह अवतार मूर्ति विराजमान है, जो अत्यंत करिश्माई मानी जाती है।

द्वापर युग

राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी

द्वापर युग में श्री राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं एवं क्रीड़ाओं के साथ इस तलहटी में लंबे समय तक विचरण हुआ था। उनके चरणों से स्पर्श हुई रज-कणों के कुछ कण आज भी इसी पावन तलहटी में विद्यमान हैं, जो इस स्थान को अत्यंत दिव्य बनाते हैं।

प्राचीन काल से

ऋषि-मुनियों की तपोभूमि

श्री गोवर्धन पर्वत में स्थित गुफाओं-कंदराओं में आज भी ऋषि-मुनि, संत-महात्मा तप, तपस्या एवं साधना में राधा-कृष्ण का भजन कर रहे हैं। रात्रि की बेला में वे इसी तलहटी में भ्रमण कर अपने शरीर से उन्हीं रज-कणों को लगाते हैं, जो राधा-कृष्ण के चरणों से स्पर्श हुई हैं।

पौराणिक स्थल

नवल कुण्ड एवं अप्सरा कुण्ड

इसी तलहटी में स्थित पूंछरी में नवल कुण्ड एवं अप्सरा कुण्ड हैं, जिनका संबंध द्वापर युग से राधा-कृष्ण की बाल लीलाओं एवं क्रीड़ाओं से रहा है। ये पवित्र कुण्ड आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं।

पौराणिक काल से

श्री गिर्राज महाराज की महाआरती एवं प्रभुपाद जी की तपस्या

इसी तलहटी के मध्य सबसे पावन-पवित्र स्थल पर बना प्राचीन मंदिर श्री नृसिंह देव जी महाराज का है। यहाँ से श्री गिर्राज महाराज एवं गोवर्धन पर्वत की गुफाओं-कंदराओं में रह रहे ऋषि-मुनि, संत-महात्माओं की महाआरती पुराने समय से की जाती रही है। इसीलिए इस्कॉन संस्था के संस्थापक महापुरुष श्री प्रभुपाद जी महाराज ने भी इसी प्राचीन मंदिर में कुछ समय रहकर तपस्या एवं साधना की, जिन्होंने पूरी दुनिया में राधा-कृष्ण भक्ति-वेदांत का संदेश पहुँचाया।

वर्तमान

पंजीकरण एवं गौशाला सेवा

यह प्राचीन मंदिर पहले भरतपुर स्टेट सदावर्त महकमे से पंजीकृत था, अब सहायक आयुक्त देवस्थान विभाग जयपुर व उदयपुर से मंदिर श्री लालजी महाराज गढ़ी सांवलदास के साथ रजिस्टर्ड है। इसी के साथ श्री लालजी महाराज गौशाला भी संचालित है, जिसमें 2500 गौवंशों का पालन-पोषण होता है। महाकालेश्वर महाराज की विशाल नवेश्वर शिवलिंग भी इसी प्राचीन मंदिर में स्थित है।

महाकालेश्वर महाराज प्राचीन मंदिर

महाकालेश्वर प्राचीन मंदिर

यह मंदिर अत्यंत प्राचीन है। स्वयं प्रकट हुए नृसिंह देव जी की प्रतिमा चमत्कारी है। यहाँ से श्री गिरिराज महाराज के संपूर्ण दर्शन होते हैं। यह मंदिर श्री गिरिराज महाराज के चरणों का स्पर्श करते हुए निर्मित है।इसी कारण इस मंदिर की ऊँचाई से श्री गोवर्धन पर्वत तथा पर्वत की गुफाओं एवं कंदराओं में निवास करने वाले ऋषि-मुनि, संत-महात्मा और देवताओं की महाआरती का दिव्य अनुभव प्राप्त होता है।इसीलिए यह स्थान देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

यह प्राचीन मंदिर पहले भरतपुर स्टेट सदावर्त महकमा में पंजीकृत था। वर्तमान में यह सहायक आयुक्त, देवस्थान विभाग, जयपुर एवं उदयपुर के अधीन मंदिर श्री लालजी महाराज, गढ़ी सांवलदास के साथ पंजीकृत है।इसी संस्था के अंतर्गत श्री लालजी महाराज गौशाला का भी संचालन किया जा रहा है, जहाँ लगभग 2500 गौवंशों का पालन-पोषण एवं सेवा की जाती है।

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