Lali Ji Mandir
Temple

Lali Ji Mandir

Sacred Temple of Shri Lal Ji Maharaj

श्री लाल जी महाराज मंदिर

Lal Ji Maharaj

श्री लाल जी महाराज मंदिर का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना है। यह पावन स्थल बाबा सांवलदास जी महाराज की तपोभूमि रहा है, जहाँ महाराजा सूरजमल जी को दिव्य आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।

इसी आशीर्वाद से भरतपुर रियासत की स्थापना हुई। यहाँ श्री लाल जी महाराज (श्री रामचंद्र जी, लक्ष्मण जी एवं सीता जी) की भव्य प्रतिमाएँ स्थापित हैं, साथ ही शिव-पार्वती एवं हनुमान जी का मंदिर भी विराजमान है।

आज भी यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है, जहाँ प्रतिदिन सैकड़ों भक्त दर्शन-पूजन हेतु आते हैं। मंदिर के संपूर्ण इतिहास एवं महंत परंपरा की जानकारी नीचे टाइमलाइन में विस्तार से दी गई है।

मंदिर का इतिहास

~400 वर्ष पूर्व

मंदिर की स्थापना एवं बाबा सांवलदास जी की तपोभूमि

आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व यह क्षेत्र घना जंगल था, जब यहाँ एक कच्ची पहाड़ीनुमा गढ़ी हुआ करती थी। इसी गढ़ी में बाबा सांवलदास जी महाराज की एक गुफा बनी हुई थी, जहाँ बाबा भजन-ध्यान किया करते थे। पास ही एक कच्चा जल कुण्ड था, जहाँ बाबा लगभग 50 से 100 गायें रखा करते थे। ये गायें जंगल में विचरण करते हुए इसी कुण्ड में पानी पीती थीं और बाबा की गढ़ी पर आकर बैठती थीं। बाबा स्वयं उनकी सेवा किया करते थे।

1727

महाराजा सूरजमल जी का आगमन एवं दिव्य आशीर्वाद

वर्ष 1727 के आसपास महाराजा सूरजमल जी घोड़े पर सवार होकर इसी क्षेत्र में शिकार खेलने आए थे। उसी समय उन्होंने इसी कुण्ड में शेर और गायों को एक ही घाट पर पानी पीते हुए देखा। यह अद्भुत दृश्य देखकर महाराजा अत्यंत आश्चर्यचकित हुए। तभी गुफा से बाहर निकलते हुए बाबा सांवलदास जी महाराज को देखकर उन्होंने प्रणाम किया। बाबा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि डीग को छोड़कर भरतपुर को अपनी राजधानी बनाओ, आप दिल्ली तक विजय प्राप्त करोगे।

1727 के बाद

भरतपुर की स्थापना एवं मंदिर निर्माण

बाबा सांवलदास जी महाराज का आशीर्वाद लेकर तथा उनकी प्रेरणा से महाराजा सूरजमल जी ने भरतपुर को अपनी राजधानी बनाया। इसी के साथ गायों के लिए बने कच्चे कुण्ड को पक्का करवाया गया तथा एक छोटी गौशाला का निर्माण करवाया गया। इसी स्थान पर एक विशाल मंदिर का निर्माण भी करवाया गया, जिसमें श्री लाल जी महाराज (श्री रामचंद्र जी, लक्ष्मण जी एवं सीता जी) की बाल स्वरूप प्रतिमाएँ स्थापित की गईं। इसके साथ ही शिव जी, पार्वती जी एवं हनुमान जी का भी मंदिर बनवाकर मूर्तियाँ स्थापित की गईं। इस मंदिर का नक्शा उस समय एक बड़े इंजीनियर से विशेष रूप से तैयार करवाया गया था, और उसी नक्शे के अनुसार आज भी यह भव्य मंदिर पूर्ववत खड़ा है।

~200 वर्ष पश्चात

बाबा सांवलदास जी की समाधि

बाबा सांवलदास जी महाराज की अवस्था लगभग 200 वर्ष हो गई। अधिक उम्र से परेशान होकर बाबा मंदिर लालजी महाराज, गढ़ी सांवलदास गुफा से दण्डवत परिक्रमा करते हुए गोवर्धन पहुँचे और अपने ही मंदिर श्री नृसिंह देव जी महाराज के गेट के समक्ष जीते ही समाधि लेकर प्राण त्याग दिए। इसका प्रमाण गंगा स्थल सौरों जी के पण्डा जी के पास है, क्योंकि बाबा सांवलदास जी की अस्थियों के कलश में केवल पुष्प ही गए, अस्थियाँ नहीं गईं। आज भी उनकी समाधि एवं छतरी पक्के पत्थर की बनी हुई है, जहाँ हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं।

1940 – 1982

बाबा दामोदर दास जी – पंजीकरण एवं व्यवस्थापन

बाबा दामोदर दास जी महाराज इस गद्दी के महंत सन् 1940 में हुए जो सन् 1982 तक रहे। इन्होंने ही देश की आज़ादी के बाद इस धार्मिक गद्दी (मंदिर) श्री लालजी महाराज गढ़ी सांवलदास भरतपुर के नाम से राजस्थान सार्वजनिक न्यास अधिनियम 1959 के तहत सन् 1962 में सहायक आयुक्त देवस्थान विभाग जयपुर से एवं आयुक्त देवस्थान विभाग उदयपुर से पंजीकरण करवाया, जो आज दिनांक तक जारी है।

1996 से वर्तमान

महंत श्री शिशुपाल दास जी

सन् 1996 से महंत श्री शिशुपाल दास जी हैं, जो इस मंदिर एवं ट्रस्ट के विस्तार व विकास हेतु निरंतर कार्यरत हैं। इनके मार्गदर्शन में मंदिर परिसर का विकास एवं गौसेवा कार्य आज भी सुचारू रूप से चल रहा है।