Goshala
The Sacred Journey of Shree Gaushala
श्री गौशाला मंदिर श्री लाल जी महाराज गढ़ी व जौरा गौशाला की स्थापना वर्ष 1727 में महाराज सूरज मल जी द्वारा बाबा संवलदास जी महाराज के आशीर्वाद से हुई थी।
Our Sacred Journey
गौशाला की स्थापना एवं प्रारम्भिक इतिहास
महंत बाबा सांवलदास जी महाराज के समय से ही इस स्थान पर कच्ची गढ़ी में गौसेवा, भजन और तपस्या का कार्य होता था। उस समय यहाँ घना जंगल था, जहाँ गायों के लिए छाया तथा वर्षभर स्वच्छ जल की व्यवस्था प्राकृतिक कुंड के माध्यम से उपलब्ध रहती थी।
पक्की गौशाला का निर्माण
6 सितम्बर 1947 को भरतपुर स्टेट द्वारा पक्की गौशाला, बाउंड्रीवाल, चारा गृह, पानी की व्यवस्था तथा अन्य आवश्यक निर्माण कार्यों के लिए ₹13,083 स्वीकृत किए गए। यह निर्माण लगभग तीन वर्षों में पूर्ण हुआ।
सरकारी गौवंश स्थानांतरण
राजस्थान सरकार ने श्री कृष्ण-गिरराज गौशाला को बंद कर वहाँ के समस्त गौवंश को गौशाला मंदिर श्री लालजी महाराज, गढ़ी सांवलदास में स्थानांतरित करने का आदेश जारी किया।
राजस्थान गौशाला अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण
19 जनवरी 1971 को राजस्थान गौशाला अधिनियम, 1960 की धारा 5 के अंतर्गत गौशाला का विधिवत पंजीकरण कराया गया, जिससे इसे कानूनी मान्यता प्राप्त हुई।
पुनः पंजीकरण एवं राष्ट्रीय मान्यता
बाबा दामोदर दास जी के पश्चात महंत शिशुपाल दास जी द्वारा 4 सितम्बर 1996 को गौशाला का पुनः पंजीकरण कराया गया। इसके बाद भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड, चेन्नई से भी पंजीकरण एवं मान्यता प्राप्त हुई।
गौवंश संरक्षण एवं निरंतर विकास
महंत शिशुपाल दास जी के नेतृत्व में गौशाला का निरंतर विकास हुआ। वर्ष 2005–06 में गौशाला में 2,131 गौवंशों का पालन-पोषण किया जा रहा था। वर्ष 2018 में यह संख्या 1,918 रही, जबकि वर्तमान में गौशाला में लगभग 2,500 गौवंशों का संरक्षण, पालन-पोषण एवं सेवा की जा रही है।
राजकीय पंजीकरण एवं आर्थिक सहायता
महाराजा किशन सिंह जी के जन्म के समय गौशाला का पंजीकरण कराया गया। गौशाला के संचालन हेतु भरतपुर स्टेट द्वारा नगर पालिका की चुंगी आय का 6% भाग नियमित रूप से गौशाला को प्रदान किया जाता था।
महंत परंपरा एवं फेडरेशन सदस्यता
बाबा दामोदर दास जी महाराज के समय गौशाला राजस्थान स्टेट गौशाला फेडरेशन, जयपुर की सदस्य बनी। 18 अप्रैल 1959 को इसका पंजीकरण हुआ और यह भरतपुर जिले की एकमात्र पंजीकृत गौशाला के रूप में स्थापित हुई।
कुम्हेर गौशाला का विलय
22 जुलाई 1963 को पशुपालन विभाग, जयपुर के आदेशानुसार कुम्हेर स्थित श्री कृष्ण-गिरराज गौशाला के सभी गौवंश को गढ़ी सांवलदास गौशाला में स्थानांतरित किया गया तथा पुरानी गौशाला को बंद कर दिया गया।
पशु प्रजनन केन्द्र से गौवंश आगमन
14 अक्टूबर 1995 को कुम्हेर पशु प्रजनन केन्द्र से भी सभी गौवंशों को गौशाला मंदिर श्री लालजी महाराज, गढ़ी सांवलदास में स्थानांतरित किया गया।
कर छूट, सम्मान एवं आधुनिक विकास
गौशाला को आयकर अधिनियम की धारा 12AA एवं 80G के अंतर्गत पंजीकरण प्राप्त हुआ तथा सहकारिता विभाग में भी पंजीकरण कराया गया। महंत शिशुपाल दास जी के नेतृत्व में गौशाला का उल्लेखनीय विकास हुआ। वर्ष 2005-06 में गौवंश की संख्या 2131 तक पहुँची तथा 26 जनवरी 2026 को जिला डीग-भरतपुर की सर्वश्रेष्ठ गौशाला का सम्मान प्राप्त हुआ।
गोबर गैस संयंत्र
श्री लालजी महाराज गौशाला में आधुनिक गोबर गैस संयंत्र स्थापित किया गया है, जहाँ गौवंश से प्राप्त गोबर का वैज्ञानिक एवं पर्यावरण-अनुकूल तरीके से उपयोग किया जाता है। इस संयंत्र में निर्मित बायोगैस का उपयोग ऊर्जा के रूप में किया जाता है, जबकि इससे प्राप्त जैविक स्लरी उत्कृष्ट प्राकृतिक खाद के रूप में कृषि कार्यों में प्रयोग की जाती है। यह व्यवस्था स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण एवं आत्मनिर्भर गौशाला की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।